Monday, May 21, 2018

आस

आस तो थी तुमसे
पर कोई खास नहीं थी
इतनी सी थी कि
जब सारी दुनिया खड़ी हो
मेरे विरोध में,
तब तुम को अपने साथ
खड़ा पाऊँ,
मेरी खुद्दारी पर
तुम्हें नाज़ करता देखूँ,
मेरा मान सम्मान ही
तुम्हारा स्वाभिमान हो और
जब दुनिया के कदम उठें
मेरा स्वाभिमान कुचलने को,
तब तुम उसे हथेलियों में समेट
अपने हृदय में छुपा लो !
लेकिन तुम्हारा अपना ही
आत्माभिमान इतना व्यापक हो गया
कि तुम्हारे हृदय में अब
किसी और के लिए जगह 
बची ही नहीं है !!!
फिर भी, 
मैं इंतजार करूँगी,
शायद कभी तुम्हारे हृदय के
किसी कोने में
जरा सी जगह मिल जाए....
मुझे नहीं, मेरी खुद्दारी को !
मुझे नहीं, मेरे स्वाभिमान को !
मुझे नहीं, मेरी भावनाओं को !!!

Sunday, May 20, 2018

नदिया के दो तट

युग युग से चलते संग, मगर
अभिशाप विरह का सहते हैं,
मजबूर नियति के हाथों में
निःशब्द व्यथा को कहते हैं !
हम जीवन नदिया के दो तट !!!

जलती है कितने जन्मों से,
प्राणों की ज्योत प्रतीक्षा में,
फिर जन्मों का अनुबंध करूँ,
तुम आ जाओ तो बंद करूँ,
मैं अपने हृदय - द्वार के पट !!!

मिलने की आस लगाएँगे,
मरकर भी खुले रह जाएँगे,
प्रिय दर्शन को खुद प्यासे रह,
गगरी जल की छलकाएँगे,
मेरे दो नयनों के पनघट !!!

मचलें जब सागर की लहरें,
चंदा को बाँहों में भरने,
जब उफने उदधि किनारों पर,
तब एकाकी मँझधारों पर,
ढूँढ़े नैया अपना केवट !!!

कान्हा भी नहीं, राधा भी नहीं
ना मीठी ध्वनि मुरलिया की,
क्यूँ प्रीत की आज भी रीत वही,
क्यूँ राह तकें उस छलिया की,
यमुना का तट और वंशी - वट !!!
(चित्र गूगल से साभार)




Wednesday, May 16, 2018

बस यही है ज़िंदगी !

ग़म छुपाकर मुस्कुराना, बस यही है ज़िंदगी !
अश्क पीकर खिलखिलाना,बस यही है ज़िंदगी !

इक सितारा आसमां में है मेरे भी नाम का,
उसको आँखों में छुपाना, बस यही है ज़िंदगी !

मरने की तो लाख वजहें हैं जहां में दोस्तों !
एक जीने का बहाना, बस यही है ज़िंदगी !

तेरे महलों की दीवारें, सोने - चाँदी की सही,
तिनकों का मेरा आशियाना, बस यही है ज़िंदगी !

टूटकर गिरना मेरे दिल का, तेरे कदमों में यूँ 
और तेरा ठोकर लगाना, बस यही है ज़िंदगी !

फूल खिलते हैं मुहब्बत के, वफ़ा की बेल पर
रस्म-ए- उल्फत का निभाना, बस यही है ज़िंदगी !