Saturday, December 23, 2017

लम्हे

खनकती चूड़ियों वाली सुबहें
छ्नकती झाँझरों वाली रातें,
नर्म नाजुक से महकते लम्हे,
बंद हैं वक्त के पिटारे में !

प्यार की धड़कनों को सुनते हुए
ख्वाब आँखों में नए बुनते हुए,
शबनमी शब के बहकते लम्हे
बंद हैं वक्त के पिटारे में !

पंखुरी खोलते फूलों जैसे,
अनकहे, अनसुने बोलों जैसे,
रेत की तरहा फिसलते लम्हे,
बंद हैं वक्त के पिटारे में !

रेशमी सलवटों को छूते हुए,
जैसे खुशबू की फसल बोते हुए,
मिलती नज़रों से सिहरते लम्हे,
बंद हैं वक्त के पिटारे में !

कहने सुनने हैं फसाने कितने
कैद में गुजरे, जमाने कितने !
बाहर आने को तरसते लम्हे
बंद हैं वक्त के पिटारे में !

Tuesday, December 19, 2017

दो बालगीत

1- जानवरों का नववर्ष
जंगल के पशुओं ने सोचा
हम भी धूम मचाएँ ,
मानव के जैसे ही कुछ
हम भी नववर्ष मनाएँ !

वानर टोली के जिम्मे है
फल-फूलों का इंतज़ाम,
मीठे-मीठे मधु के छत्ते
ले आएँगे भालूराम !

हिरन और खरगोश पकाएँ
साग और तरकारी,
सारे पक्षी मिलजुल कर लें
दावत की तैयारी !

नृत्य कार्यक्रमों का
निर्देशन करवाएँगे मोर,
गायन के संचालन में
कोकिलजी मग्न विभोर !

शेरसिंह और हाथीजी तो
होंगे अतिथि विशेष,
आमंत्रित सारे पशु-पक्षी
कोई रहे ना शेष !

कोई पशु किसी को,
उस दिन ना मारे,ना खाए !
एक दिवस के खातिर सब
शाकाहारी बन जाएँ !

जश्न मनाएँ नए वर्ष का,
मौज करें, नाचे गाएँ !
इंसानों को  नए साल की
भेजें शुभ - कामनाएँ !!!
******************
2- ध्वनि - गीत
टपटप टिपटिप बूँदें गिरतीं,
रिमझिम वर्षा आती !
झरझर झरझर बहता झरना,
कलकल नदिया गाती !

टणटण करता घंटा बाजे,

घुँघरू करते रुनझुन !
किर्र किर्र झिंगुर करता है,
भौंरे करते गुनगुन !

काँव-काँव कौआ चिल्लाए,
कोयल कुहू-कुहू गाती !
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ करती चिड़िया,
दिन भर शोर मचाती !

खड़-खड़ करते सूखे पत्ते,
इधर-उधर उड़ जाते !
सर-सर करती चले हवा तो,
पौधे कुछ झुक जाते !

छुमछुम पायल को छ्नकाती,
गुड़िया मेरी आती !
मिट्ठू - मिट्ठू तोते जैसी,
तुतलाकर बतियाती !!!


Saturday, December 16, 2017

सुन रहे हो ना....

गर्जते बादलों से
बारिश नहीं होती,
खामोश मेघों का भरा मन
फूट पड़ता है !
तुम सुन रहे हो ना,
मुझे कुछ बताना है तुम्हे....

वह फुलचुही चिड़िया
फिर आई थी फूलों पर !
बुलबुल ने मुँडेर से ही
'हैलो' कह दिया था !
कबूतरों का जोड़ा बारबार
मँडरा रहा था बालकनी में
घरौंदा बनाने की फिराक में

और हाँ,आजकल आ रही है
एक नई मेहमान भी !
चिकचिक करती गिलहरी!
चिड़ा चिड़िया रोज आते हैं
बच्चों को साथ लेकर !

सांझ पड़े, दूर आसमां में
बगुलों को उड़ते देख
मन उड़ने को होता है !
वो तांबई भूरे पंखों वाली
कोयल रोज बैठती है
सामने के पेड़ पर खामोश !
गाती क्यों नहीं ?
क्या गाने का मौसम
नहीं है यह ?

याद है तुम्हें, तुमने कहा था...
तुम्हारी अच्छी रचनाएँ
उभरती हैं हमारे झगड़े के बाद !
ये कैसी है ?
और कहा था तुमने....
"तुम्हें संवाद करना नहीं आता,
प्रेमपत्र क्या खाक लिखोगी ?"
ये कैसा है ?

तुम सुन रहे हो ना ?
मुझे और भी बहुत कुछ
कहना है, बताना है !!!
पर....





Thursday, December 7, 2017

खो गई...'वह'

टुकड़े-टुकड़े जिंदगी में,
जिंदगी को खोजती है ।
बँट गई हिस्सों में,
खुद को खोजती है ।

वह सहारा, वह किनारा,
और मन का मीत भी !
आरती वह, वही लोरी,
वही प्रणयगीत भी ।

वह पूजाघर का दीप,
रांगोली, वंदनवार !
वह झाड़ू, चूल्हा, चौका,
वही छत, नींव, दीवार !!

वृद्ध नेत्रों के लिए
इक रोशनी है वह,
और बच्चों के लिए
जादुई जिनी है वह ।

प्रियतम की पुकार पर
प्रियतमा वह बन गई,
दूर करने हर अँधेरा
खुद शमा वह बन गई !

पत्नी, माँ, भाभी, बहू,
क्या क्या नहीं वह ?
और यह भी सत्य,
इनमें खो गई...'वह' ।।

Tuesday, December 5, 2017

आखिर क्यों ?

रख दी गिरवी यहाँ अपनी साँसें
पर किसी को फिकर तो नहीं
बहते - बहते उमर जा रही है
आया साहिल नजर तो नहीं....

वक्त अपने लिए ही नहीं था
सबकी खातिर थी ये जिंदगी,
जो थे पत्थर के बुत,उनको पूजा
उनकी करते रहे बंदगी !

जिनकी खातिर किया खुद को रुसवा
उनको कोई कदर तो नहीं !
बहते - बहते उमर जा रही है,
आया साहिल नजर तो नहीं....

अपना देकर के चैन-औ-सुकूँ सब,
खुशियाँ जिनके लिए थीं खरीदी,
दर पे जब भी गए हम खुदा के,
माँगी जिनके लिए बस दुआ ही !

वो ही जख्मों पे नश्तर चुभाकर,
पूछते हैं, दर्द तो नहीं...?
बहते-बहते उमर जा रही है,
आया साहिल नजर तो नहीं....

रख दी गिरवी यहाँ अपनी साँसे,
पर किसी को फिकर तो नहीं
बहते - बहते उमर जा रही है,
आया साहिल नजर तो नहीं...

Monday, December 4, 2017

जब हम बने सर्पमित्र !

जब हम बने सर्पमित्र !
(डायरी 2 sep 2017)
 दोपहर 1.30 बजे स्कूल से लौटी। बिल्डिंग के नीचे पार्किंग एरिया दोपहर के वक्त खाली होता है, वहीं से गुजरकर लिफ्ट की ओर बढ़ते समय पाया कि 12 से 15 वर्ष के चार लड़के एक कोने को घेरकर बड़े ध्यान से कुछ देख रहे हैं।

उत्सुकतावश वहाँ जाकर देखा तो पाया कि बच्चों ने कोने में दीवार का आधार लेकर दो साइकिल लगा रखी थीं और उनके पीछे ठीक कोने में साँप !
साँप गोलमटोल गठरी सा होकर कोने में पड़े पत्थर के पास गहरी नींद का आनंद ले रहा था और बच्चे 'मार दिया जाय कि छोड़ दिया जाय, बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाय' वाली मुद्रा में चर्चा कर रहे थे।

मैंने बच्चों को दूर किया और वाचमैन को बुलाया। वाचमैन काका सीधे एक बड़ा सा पत्थर पटककर साँप का क्रियाकर्म कर देने के पक्ष में थे, मैं उसे पकड़कर कहीं दूर छोड़ देने के पक्ष में थी, लड़के मेरे पक्ष में हो गए थे। साँप जी हमारे इरादों से बेखबर स्वप्नलोक में खोए रहने के पक्ष में थे।

इस कॉलोनी को बने हुए अभी तीन वर्ष ही हुए हैं और मुझे यहाँ आए दो वर्ष। पाँच सात साल पहले तक इस जमीन पर घने पेड़ पौधे थे जिन्हें हटाकर यह बस्ती बसाई गई। साँप हर बारिश में निकलते रहते हैं यहाँ, पीछे का परिसर अब भी जंगल सा ही है।

वाचमैन ने कहा,"मैडम, अब तक पाँच मार चुके हैं हम! आपको क्या पता, आप तो सुबह जाते हो रात को लौटते हो।" मैं - "हाँ काका, मारे होंगे आपने पाँच पर ये तो मेरे सामने आ गया। मैं कोशिश करती हूँ कि कोई इसे पकड़कर दूर छोड़ दे।"

मैंने शैलेश सर को फोन किया जो क्लासेस में विज्ञान पढ़ाते हैं। शायद उनके पास किसी सर्पमित्र (snake rescuer) का नंबर हो। सर ने पाँच मिनट में ही एक सर्पमित्र का नंबर मैसेज किया। उसे फोन करने पर पता चला कि वह बाहर है और कल लौटेगा।

अब मैं क्या करूँ? साढ़े तीन बजे मुझे क्लासेस जाना था। उसके पहले खाना बनाना और खाना भी था। तभी मेरा बेटा अतुल कालेज से लौट आया। अब मेरे पक्ष में पाँच लोग हो गए।

इस बीच वहाँ से दो तीन महिलाएँ गुजरीं और वाचमैन को साँप मारने का निर्देश देकर चली गईं। साँप की प्रजाति पर भी अटकलें लगाईं गईं।
अब हमने स्वयं ही सर्पमित्र बनने का निश्चय कर लिया।

मैं साँप को अतुल के भरोसे छोड़कर घर गई और एक ढक्कन वाली बास्केट, एक कॉटन की चादर और एक झाड़ू लाई। उस वक्त यही समझ में आया।       
आसपास इतनी हलचल होने पर भी साँप का यूँ सोते रहना असामान्य बात थी। कहीं मरा हुआ तो नहीं? एक रिस्क ली। झाड़ू के पिछले डंडे से साँप को स्पर्श किया तो वह थोड़ा सा हिलकर फिर शांत हो गया, जैसे छोटे बच्चे माँ के जगाने पर 'उँहूँ ! अभी नहीं !' कहकर करवट बदलकर फिर सो जाते हैं।

तब तक अतुल ने वाचमैन का डंडा लिया।आसपास निरीक्षण करने पर एक धातु का तार पड़ा मिल गया। तार को मोड़कर हुक की तरह बनाकर डोरी से डंडे के सिरे पर बाँधा गया। तब तक लड़कों ने साँप के फोटो, वीडियो खींच लिए। वाचमैन 'ध्यान से, सावधानी से' कहता जा रहा था।

अतुल ने टोकरी को साँप के पास आड़ी पकड़कर हुक से साँप को झट से उठाकर टोकरी में डाल दिया और मेरे मुँह से सिर्फ इतना निकला - "अरे वाह !" टोकरी का ढक्कन तुरंत बंद कर दिया गया। टोकरी के हिलते ही साँप महाशय अपनी गहन निद्रा से जाग गए और पूरा शरीर खोलकर दिखाया - देखो, इतना भी छोटा नहीं मैं !

बंद टोकरी को पकड़कर एक लड़का अतुल के पीछे बाइक पर बैठा । वह नहीं जाता तो इस एडवेंचर के लिए मैं तैयार थी। साँपजी ने भी बाइक की सवारी का अनुभव पहली बार लिया होगा। कुछ ही देर में दोनों बच्चे साँप को नदी किनारे विदा कर आए जो यहाँ से 10 मिनट की ड्राइविंग पर ही है।

   घर लौटने पर मैंने अतुल से पूछा क्या उसे डर नहीं लगा ? तब उसका जवाब था कि बचपन में डिस्कवरी चैनल ज्यादा देखा था ना, इसलिए डर नहीं लगता।
मोगेम्बो (अतुल) खुश है साँप को 
पिंजरे में बंद करके !
गहरी नींद में 
बाइक की सवारी करते साँप महाशय

Sunday, December 3, 2017

ढूँढ़े दिल !

अंजानों की इस बस्ती में,
कोई पहचाना ढूँढ़े दिल !
मंदिर-मंदिर,मस्जिद-मस्जिद,
यूँ रब का ठिकाना ढूँढ़े दिल !

तेरी गलियों में आ पहुँचा है
भटक-भटक कर दीवाना,
अब ज़ब्त नहीं होते आँसू,
रोने का बहाना ढूँढ़े दिल !

जन्मों की बातें रहने दो
कुछ और मुलाकातें दे दो,
इक जन्म में,सातों जन्मों के,
वादों का निभाना ढूँढ़े दिल !

हर शे'र पे आह निकलती थी
हर मिसरे पे बहते थे आँसू,
वो खूने ज़िगर से लिखी हुई,
गज़लों का जमाना ढूँढ़े दिल !

आँखों में नूर मुहब्बत का
साँसों में वफा की खुशबू हो,
इखलास हो लफ्जों में जिसके,
ऐसा दीवाना ढूँढ़े दिल !

Sunday, November 26, 2017

बूँद समाई सिंधु में !

प्रीत लगी सो लगि गई,
अब ना फेरी जाय ।
बूँद समाई सिंधु में,
अब ना हेरी जाय ।।

हिय पैठी छवि ना मिटे,
मिटा थकी दिन-रैन ।
निर्मोही के संग गया,
मेरे चित का चैन ।।

परदेसी के प्रेम की,
बड़ी अनोखी रीत ।
बिना राग की रागिनी,
बिना साज का गीत ।।

नयन भरे तो यों भरे,
हो गए नदी - समंद ।
कस्तूरी मृग बावरा,
खोजत फिरे सुगंध ।।

पुष्प-पुष्प फिरता भ्रमर,
रस चाखे, उड़ि जाय ।
मुरझाए, सूखे सुमन,
तब भँवरा नहिं आय ।।

पिहू-पिहू पपिहा करै,
घन को ताके मोर ।
प्रीति हमारी जानिए,
जैसे चंद्र - चकोर ।।
              --- मीना शर्मा ----

Thursday, November 23, 2017

प्रेम

व्यंग्य के तीरों से भरे
तरकश से निकला
फिर एक नया तीर
और उतर गया,सीधा
उसके कलेजे में !

कलेजे में तो सिर्फ
एक नया छिद्र हुआ,
वहाँ कुछ था ही कहाँ
जो बहता, रीतता !

आँखें तो झरोखा रही थीं,
दिल की मासूमियत और
इरादों की पाकीज़गी का,
नहीं सहा गया दर्द 
दो आँखों से, जमाने भर का !

आँखों की सहनशीलता
जवाब दे गई
लहू की धारा आँखों से
बह निकली !

अपने-पराए, सारे घबराए
पास ना कोई आए
लहू का लाल रंग
डरा देता है सबको !

कुछ समय बाद देखा
जमीं पर लाल अक्षरों में
उसी लहू के रंग से
उसने लिखा था एक शब्द
ढ़ाई आखर का --
- प्रेम -



Sunday, November 19, 2017

शहद है तू !



मेरे जीने की वजह है तू
जमाना हार, फतह है तू !!!

मैं अँधेरों से नहीं डरती अब
मेरी रातों की, सहर है तू !!!

तेरे होने से मुकम्मल हूँ मैं
जिस्म हूँ मैं, तो रूह है तू !!!

मेरे ओठों की तबस्सुम तुझसे
ज़िंदगी से मेरा रिश्ता है तू !!!

तू सिर्फ चाँद और सूरज ही नहीं,
मेरी आँखों का सितारा है तू !!!

तेरे माथे को चूमकर कह दूँ
इतना मीठा है, शहद है तू !!!
********************
(बेटे अतुल के लिए)


Tuesday, November 14, 2017

बालदिवस के अवसर पर

सुबह-सुबह मुझसे जैसे ही मिलते हो तुम,
बगिया में खिलते से फूल लगते हो तुम।

पक्षियों की भाँति चहचहाते रहते हो तुम,
हरदम दिल के करीब रहते हो तुम ।
पक्षी उड़ें आसमान, आप दौड़ें कॉरीडोर,
लगभग दोनों ही समान लगते हो तुम ।।
सुबह-सुबह मुझसे....

यूनीफॉर्म के नाम पर, एकदम 'कूल' हो,
लाइट पंखा अक्सर, बंद करना जाते भूल हो।
रीडिंग के नाम पे हो जाते आप बोर हो,
मेरे लिए फिर भी, पतंग वाली डोर हो।।

चलते पीरियड में जाने कहाँ खोए रहते हो,
पीटी जाने के ही तुम सपने सजाते हो।
भोले बन जाते हो टीचर की नजर पड़ते ही,
छुट्टी का नोटिस देख, फूले ना समाते हो ।।

टीचर पढ़ाने की जैसे ही शुरूआत करें,
आप अपने मित्रों से, बातों की शुरूआत करें।
अनगिनत बहाने-कभी पेट,कभी सिरदर्द
कितने ही दर्दों की दुकान लगते हो तुम !!!
सुबह-सुबह मुझसे.....

दर्दों का कोई रंग-रूप नहीं होता है,
वैसे ही कॉपी का काम पूरा नहीं होता है।
सबमिशन की डेट कभी सुनते नहीं हो आप,
अदालत में चलते मुकदमे की भाँति आप
तारीखों पे तारीखें बढ़ाते चले जाते हो,
फिर भी मेरे मन को बहुत ही लुभाते हो ।।

आज पेन नहीं, कल कॉपी नहीं होती है,
स्कूल डायरी बैग में, शायद ही कभी होती है।
पूछूँ जो किताब, बोलें - I forgot mam,
कहके, मेरे बीपी को बढ़ाते चले जाते हो ।

कंप्यूटर के मामले में टीचर्स से आगे हो तुम,
स्मार्टबोर्ड चलाना, टीचर्स को सिखाते हो।
चाहे जितनी डाँट खाओ, टीचर से साल भर,
'हैप्पी टीचर्स डे' फिर भी विश करके जाते हो।

आखिर तो बच्चे हो, दिल के बड़े सच्चे हो,
मेरे दिल में छुपी हुई माँ को जगाते हो।
ज़िंदगी में किसी भी मुकाम पर पहुँच जाओ,
शिक्षकों को अपने, तुम कभी ना भुलाते हो।

तुम मेरे मन को, बहुत ही लुभाते हो !
तुम मेरे मन को, बहुत ही लुभाते हो !!
सुबह- सुबह मुझसे......
**********************************
(यह कविता मेरी नहीं है। किसकी है, मैं नहीं जानती। बच्चों को सुनाने के लिए अच्छी कविताओं की खोज में मैं सदा ही रहती हूँ, ये जानकर मेरी एक सहेली द्वारा यह मुझे प्रेषित की गई । इसके आखिरी दो छंद मैंने जोड़े हैं और इसे सुनाने पर बच्चे बहुत ज्यादा खुश हुए। शायद इसलिए कि एक तो इसमें कोई नसीहत नहीं दी गई है और दूसरा यह कि यह वैसी हिंदी में है, जैसी बच्चे बोलते हैं आजकल । जो भी हो, बच्चों के चेहरे पर हँसी तो आई। कविता के रचयिता जो भी हों, मैं सारा श्रेय उन्हें देती हूँ। आभार ।)

Monday, November 13, 2017

एकाकी मुझको रहने दो

एकाकी मुझको रहने दो.
-----------------------------
पलकों के अब तोड़ किनारे,
पीड़ा की सरिता बहने दो,
विचलित मन है, घायल अंतर,
एकाकी मुझको रहने दो।।

शांत दिखे ऊपर से सागर,
गहराई में कितनी हलचल !
मधुर हास्य के पर्दे में है,
मेरा हृदय व्यथा से व्याकुल
मौन मर्म को छू लेता है,
कुछ ना कहकर सब कहने दो !
एकाकी मुझको रहने दो।।

कोमल कुसुमों में,कलियों में,
चुभते काँटे हाय मिले,
चंद्र नहीं वह अंगारा था,
जिसको छूकर हाथ जले,
सह-अनुभूति सही ना जाए
अपना दर्द स्वयं सहने दो !
एकाकी मुझको रहने दो।।

यादों के झरने की कलकल
करती है मन को विचलित !
क्या नियति ने लिख रखा है,
जीवन क्यूँ यह अभिशापित ?
गाए थे हमने जो मिलकर 
उन गीतों को अब रोने दो !
एकाकी मुझको रहने दो ।।

पलकों के अब तोड़ किनारे,
पीड़ा की सरिता बहने दो, !
विचलित मन है, घायल अंतर,
एकाकी मुझको रहने दो।।

Saturday, November 11, 2017

लावारिस लाश

मौन की सड़क पर
पड़ी रही एक रिश्ते की
लावारिस लाश रात भर !!!

आँसुओं ने तहकीकात की,
राज खुला !
किसी ने जिद और अहं का
छुरा भोंककर
किया था कत्ल उस रिश्ते का !

नंगी लाश लावारिस
पड़ी रही बेकफन रात भर !
कौन था उसका,
जो करता अंतिम संस्कार
सम्मान के साथ !

पोस्टमार्टम यानि चीरफाड़
जरूरी थी, हुई ।
हत्या आखिर हत्या है,
इंसान की हो या रिश्ते की !

दिन के पहले पहर
संवेदनाओं का चंदा इकठ्ठा किया
एक भले आदमी ने !
जैसे तैसे हासिल किया लाश को
तैयारी हो गई अंतिम यात्रा की !

सवाल अब भी था,
दफनाएँ या जलाएँ ?
कैसे पता चले इस रिश्ते का धर्म ?
तभी लाश कराही,
हैरान थे सब, एक आवाज आई -

"मैं मुहब्बत हूँ, दफना दो,
मैं प्रेम हूँ, जला दो !
निर्णय नहीं कर पाओ तो
मुझे नदी में बहा दो !
मेरे कुछ कण जल में मिलकर
धो सकें उसके कदमों को
जिसने मेरा कत्ल किया !
कह देना इतना ही उससे जाकर
मैंने उसे माफ किया !
मैंने उसे माफ किया !!
मैंने उसे माफ किया !!!"







Tuesday, November 7, 2017

जब शरद आए !


ताल-तलैया खिलें कमल-कमलिनी
मुदित मन किलोल करें हंस-हंसिनी !
कुसुम-कुसुम मधुलोभी मधुकर मँडराए,
सुमनों से सजे सृष्टि,जब शरद आए !!!

गेंदा-गुलाब फूलें, चंपा-चमेली,
मस्त पवन वृक्षों संग,करती अठखेली !
वनदेवी रूप नए, क्षण-क्षण दिखलाए,
सुमनों से सजे सृष्टि,जब शरद आए !!!


परदेसी पाखी आए, पाहुन बनकर,
वन-तड़ाग,बाग-बाग, पंछियों के घर !
मुखरित, गुंजित, मोहित,वृक्ष औ' लताएँ,
सुमनों से सजे सृष्टि, जब शरद आए !!!

लौट गईं नीड़ों को, बक-पंक्ति शुभ्र,
छिटकी नभ में, धवल चाँदनी निरभ्र !
रजनी के वसन जड़ीं हीरक कणिकाएँ,
सुमनों से सजे सृष्टि, जब शरद आए !!!


Monday, November 6, 2017

नग़मों का आना जाना है !

बुननी है फिर आज इक ग़ज़ल
लफ्जों का ताना - बाना है !
तेरे दिल से मेरे दिल तक
नग़मों का आना जाना है !

कह भी दो, दिल की दो बातें
प्यार सही, तकरार सही !
बातों-बातों में बातों से
पागल दिल को बहलाना है !

वक्त ज़िंदगी कितना देगी,
तुम जानो ना मैं जानूँ !
सपनों में आकर मिल लेना
कुछ लम्हों का अफसाना है !

किससे सीखा ओ जादूगर,
पढ़ना अँखियों की भाषा  ?
खामोशी में राज़ नया कुछ
हमको तुमसे कह जाना है !

रूठ सको तो रूठे रह लो,
नहीं मनाने आएँगे अब !
इतना कह दो बिन बादल के
सावन को कैसे आना है ?

तेरे दिल से मेरे दिल तक
नग़मों का आना जाना है !

Friday, November 3, 2017

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

यह मनु-तन पाया
हर अंग बहुमूल्य,
सद्गुणों से बन जाए
तू देवों के तुल्य !
वाणी मणिदीप है,
तो बुद्धि है प्रकाश !!!

बोल क्या नहीं तेरे पास ?

देख उन सजीवों को
तू जिनसे बेहतर !
घुट घुटकर जीना है,
मरने से बदतर !
खींचकर निकाल दे,
मन की हर फाँस !

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

मानव का जन्म मिला
सबसे अनमोल,
हीरों को कंकड़ों संग
तराजू ना तोल !
सोच जरा, समझ जरा
क्यों है निराश ?

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?

उठ सत्वर ! कर्म कर,
आलस को त्याग कर,
तपता, जलता है ज्यों
जगहित दिनकर !
कुछ स्व का, कुछ पर का,
किए जा विकास !

बोल, क्या नहीं तेरे पास ?





Sunday, October 22, 2017

खामोशियाँ गुल खिलाती हैं !

रात के पुर-असर सन्नाटे में
जब चुप हो जाती है हवा
फ़िज़ा भी बेखुदी के आलम में
हो जाती है खामोश जब !
ठीक उसी लम्हे,
चटकती हैं अनगिनत कलियाँ
खामोशियाँ गुल खिलाती हैं !!!

दर्द की बेपनाही में अक्सर
दिल चीखकर रोता है बेआवाज़
पथराई नजरों की जुबां भी
हो जाती हैं खामोश जब !
ठीक उसी लम्हे,
फफककर फूटता है आबशार
खामोशियाँ आँसू बहाती हैं !!!

किसी की खामोशी का सबब
जानकर, अनजान बनता है कोई
इश्किया गज़लों के तमाम अशआर
हो जाते हैं खामोश जब !
ठीक उसी लम्हे,
बिखरता है कोई मासूम दिल
खामोशियाँ दिल तोड़ जाती हैं !!!
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*( अशआर = शे'र का बहुवचन, बेखुदी = बेसुधी,
फ़िज़ा = प्रकृति, आबशार = झरना, गुल = पुष्प, 
सबब = कारण, पुर-असर = असरदार )*


Tuesday, October 17, 2017

एक दीप !

एक दीप, मन के मंदिर में,
कटुता द्वेष मिटाने को !
एक दीप, घर के मंदिर में
भक्ति सुधारस पाने को !

वृंदा सी शुचिता पाने को,
एक दीप, तुलसी चौरे पर !
भटके राही घर लाने को,
एक दीप, अंधियारे पथ पर !

दीपक एक, स्नेह का जागे
वंचित आत्माओं की खातिर !
जागे दीपक, सजग सत्य का
टूटी आस्थाओं की खातिर !

एक दीप, घर की देहरी पर,
खुशियों का स्वागत करने को !
एक दीप, मन की देहरी पर,
अंतर्बाह्य तिमिर हरने को !

दीप प्रेम का रहे प्रज्ज्वलित,
जाने कब प्रियतम आ जाएँ !
दो नैनों के दीप निरंतर
करें प्रतीक्षा, जलते जाएँ !
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Friday, October 13, 2017

मेरे स्नेही सागर !

मेरे स्नेही सागर !
दुनिया तुम्हें खंगालती होगी
रत्नों की चाह में,
गोताखोर लगाते होंगे डुबकियाँ
मोतियों की आस में !

किंतु मैं तो दौड़ी आती हूँ
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए !
मुझे तुम्हारे मुक्ता मणियों की
ना आस है ना चाव !

उमड़-उमड़ कर, पार करती
पर्वतों, बीहडों, जंगलों को
राह में मिले रोड़े, पत्थर, काँटे
और कितने ही गंदे नाले !
घायल अंतर, प्रदूषित तन की
भेंट लिए चली आई हूँ !

जानती हूँ मैं !
एक तुम ही हो, जिसमें शक्ति है
मेरा आवेग सँभालने की,
मुझे मुक्त करने की, इस भार से
जो ढोती आई हूँ मैं
युगों - युगों से !

कौन कहता है कि बंद हो गई है
मैला ढोने की पंरपरा !
मैं तो अब भी ढो रही हूँ !!!
यदि लोगों का बस चलता,
तो मुझे भी अछूत कह देते !

हजारों मील दूर से,
सम्मोहित सी, मार्गक्रमण करती
मानव के हर अत्याचार को झेलती,
तुममें समा जाने को अधीर,
मैं बहती रही ! बहती रही !

सुनो प्रियतम,
तुमसे मिलकर बाँध टूटा,
बहे झरझर अश्रू के निर्झर !
शायद इसीलिए खारे हुए तुम !
खारेपन की, आँसुओं की
सौगात भी सहेज ली ?

मेरे स्नेही सागर !
मैं तो दौड़ी आती हूँ
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए !











Thursday, October 5, 2017

चाँद कमल सा खिला !


रात की नीली नदी में
चाँद कमल-सा खिला !!!

झूमकर चली पवन,
विहँस पड़ी दिशा-दिशा,
चढ़ अटारी क्षितिज की,
नाच उठी ज्योत्सना !

रात की नीली नदी में
चाँद कमल-सा खिला !!!

चंचला बिजुरी दमककर
छिप गई घन के हृदय में
झाँकते नक्षत्रगण कुछ,
जुगनुओं से टिमटिमा !

रात की नीली नदी में
चाँद कमल-सा खिला !!!

आज आधी रात में
पपीहरा बेचैन क्यों ?
तीर किसकी पीर का,
उर में इसके उतर गया !

रात की नीली नदी में
चाँद कमल-सा खिला !!!

Wednesday, October 4, 2017

जिंदगी हर पल कुछ नया सिखा गई....



जिंदगी हर पल कुछ नया सिखा गई,
ये दर्द में भी हँस कर जीना सिखा गई ।

जब चुप रहे, तो जिंदगी बोली कि कुछ कहो
जब बोलने लगे तो, चुप रहना सिखा गई ।

यूँ मंजिलों की राह भी आसान नहीं थी,
बहके कदम तो फिर से सँभलना सिखा गई ।

काँटे भी कम नहीं थे गुलाबों की राह में,
खुशबू की तरह हमको बिखरना सिखा गई ।

अच्छाइयों की आज भी कीमत है जहाँ में,

दामन को दुआओं से ये भरना सिखा गई ।।

Monday, October 2, 2017

प्रार्थना


हार से बोझिल पगों को ,
जीत का आह्वान देना !
सोच को मेरी, प्रभु !
सत्प्रेरणा का दान देना ।।

प्रेम देना, स्नेह देना,
किंतु मत अहसान देना !
सत्य की कटु औषधि को,
मधुरता, अनुपान देना ।।

भीत, आशंकित हृदय की,
आस्था को मान देना !
पीड़ितों को, शोषितों को,
करूणा का वरदान देना ।।

आत्मबल को खो चुके जो,
उन्हें आत्माभिमान देना !
काँपती दीपक की लौ को,
भोर तक परित्राण देना ।।

उचित-अनुचित, बुरे-अच्छे,
मार्ग का संज्ञान देना !
खो ना जाऊँ भीड़ में,
मेरी अलग पहचान देना ।।

बापू

बापू
--- कविवर्य सुमित्रानंदन पंत --

चरमोन्नत जग में जबकि आज विज्ञानज्ञान,
बहु भौतिक साधन, यंत्रयान, वैभव महान,

सेवक हैं विद्युत, वाष्पशक्ति, धनबल नितांत,
फिर क्यों जग में उत्पीड़न, जीवन यों अशांत?

मानव ने पाई देश-काल पर जय निश्चय
मानव के पास नहीं मानव का आज हृदय !

है श्लाघ्य मनुज का भौतिक संचय का प्रयास,
मानवी भावना का क्या पर उसमें विकास ?

चाहिए विश्व को आज भाव का नवोन्मेष,
मानवउर में फिर मानवता का हो प्रवेश !

बापू ! तुम पर हैं आज लगे जग के लोचन,
तुम खोल नहीं पाओगे मानव के बंधन ?

Saturday, September 23, 2017

बस, यूँ ही....

नौकरी, घर, रिश्तों का ट्रैफिक लगा, 
ज़िंदगी की ट्रेन छूटी, बस यूँ ही !!!

है दिवाली पास, जैसे ही सुना,
चरमराई खाट टूटी, बस यूँ ही !!!

डगमगाया फिर बजट इस माह का,
हँस पड़ी फिर आस झूठी, बस यूँ ही !!!

साँझ की गोरी हथेली पर बनी,
सुर्ख रंग की बेलबूटी, बस यूँ ही !!!

झोंपड़ी में चाँदनी रिसती रही,
चाँद कुढ़ता बाँध मुट्ठी, बस यूँ ही !!!

एक दीपक रात भर जलता रहा,
तमस की तकदीर फूटी, बस यूँ ही !!!

राह तक पापा की, बिटिया सो गई,
रोई-रोई, रूठी-रूठी, बस यूँ ही !!!




Sunday, September 17, 2017

स्पंदन - विहीन !

ओ रंगीले भ्रमर !
कैसे स्वागत करती तुम्हारा ?
लाख कोशिशों से भी मुझे,
कुमुदिनी बनना न आ सका !
कंटकों के बीच जन्मी
कुसुम कलिका तो थी मैं,

किंतु.....
नागफनी का पुष्प बनकर
खिलना भी कोई खिलना है ?
गंध - मरंद विहीन !!!

ओ मेरे हृदय !
नहीं सीख पाई मैं,
तुम्हारी धड़कन बनकर गूँजना !
साँसों में समाकर, रक्त में घुलकर,
तुमको छूकर निकलती रही,
क्षण प्रतिक्षण !!!

किंतु......
गीत ना बन सकी धड़कनों का !
खामोश साँसों का
संगीत भी कोई संगीत है ?
प्रतिध्वनी विहीन !!!

ओ मेरे कवि !
नहीं बन पाई मैं,
तुम्हारी प्रेरणा, आराधना !
मैं तुम्हारी कलम की स्याही बन
थामती, सँभालती रही तुम्हारी,
भावनाओं के ज्वार को !!!

किंतु.....
स्थान मेरा सदा ही,
तुम्हारी नजरों के दायरे में रहा,
मन मस्तिष्क में नहीं !
बेजान अहसासों के साथ,
जीना भी कोई जीना है ?
स्पंदन विहीन !!!












Friday, September 15, 2017

अबूझे प्रश्न


मैंने नजर उठाकर देखा,
जब भी अपने चारों ओर...
स्वार्थ, ईर्ष्या औ' लालच का,
पाया कहीं ओर ना छोर ।

सहते रहते क्यों हर पीड़ा 

मूक, मौन, निष्पाप ह्रदय ?
किन पापों की सजा भुगतते,
निष्कपटी, निर्दोष, सदय ?

क्यों लगता है मुझको ऐसा,

सारी खुशियाँ हैं झूठी,
खिलने के पहले ही आखिर,
क्यों इतनी कलियाँ टूटीं ?

क्यों गुलाब को ही मिलता है,

हरदम काँटों का उपहार ?
क्यों रहता है कमल हमेशा,
कीचड़ में खिलने, तैयार ?

क्यों लगते हैं नकली, सारे

रिश्ते नातों के बंधन ?
इस जीवन - सागर के तट पर,
क्यों एकाकी मेरा मन ?

मन चंचल, उत्सुक बच्चे सा,
तंग करे हर पल मुझको,
निशि दिन करता है प्रश्न नए,
बोलो क्या उत्तर दूँ उसको ?

Thursday, September 14, 2017

हिंदी का क्या है !

वाणी पिछले बारह वर्षों से एक अंग्रेजी माध्यम के प्राइवेट स्कूल में बतौर हिंदी शिक्षिका कार्यरत थी।
वाणी हिंदी में एम ए थी, वो भी विशेष योग्यता के अंकों के साथ, किंतु स्कूल में हिंदी पढ़ाते समय उसे अनेक कटु अनुभवों से दो चार होना पड़ा । उसने पाया कि ना हिंदी का कोई सम्मान है और ना हिंदी शिक्षिका का ।

कई बार तो उसने पाया कि हिंदी के घंटे में पिछ्ली बेंचों पर विद्यार्थी गणित, अंग्रेजी या विज्ञान का काम करते रहते थे । हिंदी का क्या है, आसान तो है, परीक्षा के समय पढ़ लेंगे तो भी बहुत है, यह विचार बच्चों के मन में घर कर चुका था। वाणी ने यह भी पाया कि बच्चों के अभिभावक भी हिंदी की पढ़ाई के प्रति लापरवाह थे ।

हिंदी में बच्चों की लिखावट पर भी निचली कक्षाओं से ही ध्यान नहीं दिया था किसी ने । मात्राओं और व्याकरण की अशुध्दियाँ तो आम बात थी। केवल गिने चुने विद्यार्थी ही थे जो हिंदी को अन्य विषयों की तरह गंभीरता से लेते थे हालांकि उद्देश्य उनका भी एक ही था - कुछ प्रतिशत अंक ज्यादा पा लेना।

.......वाणी भी कितना करती ? आठवीं कक्षा तक नई शिक्षानीति की मेहरबानी से उत्तीर्ण होते आए विद्यार्थी जब उसे नवीं या दसवीं में मिलते, तो उनकी हालत देख वह सिर पकड़ लेती । कइयों को ठीक से पढ़ना नहीं आता, स्वर और व्यंजन तक का ज्ञान नहीं होता ।

खैर, अपनी कड़ी मेहनत और बालकों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण अपनत्व से वाणी हिंदी विषय और हिंदी साहित्य में विद्यार्थियों की रुचि जगाने में सफल रही थी। अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी थे इसलिए उन्हें जितना हो सके, सरल शब्दों में समझाती । हिंदी की कविताएँ गाकर सुनाती ताकि बच्चों को हिंदी से लगाव हो जाए। हिंदी की पाठ्येतर पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती । हिंदी से संबंधित अनेक स्पर्धाओं में अपने छात्र छात्राओं को अव्वल आते देख वह फूली नहीं समाती थी।

बारह वर्ष बीत गए। अब वाणी स्कूल में हिंदी की विभागाध्यक्ष थी। इस वर्ष हिंदी दिवस को विशेष तौर से मनाने की योजना उसने तैयार कर रखी थी। प्रधानाध्यापकजी से अनुमति भी ले ली थी। बच्चों से तैयारी भी शुरू करवा दी थी । 13 सितंबर को आधी छुट्टी के बाद चपरासी आया, "मैम, प्रिंसिपल सर ने आपको बुलाया है।"
अगला पीरियड खाली था तो वाणी प्रिंसिपल के कार्यालय में जा पहुँची । प्रिंसिपलजी ने उसे बैठने का आदेश दिया और धीर गंभीर आवाज में बोले-
"वाणी, कल का कार्यकम रद्द कर दो।"
वाणी पर तो मानो बिजली गिर पड़ी। उसने थोड़ा नाराजी भरे स्वर में कहा, " लेकिन सर, बच्चे सारी तैयारी कर चुके हैं ।"
प्रिंसिपल - "हाँ, तो उनकी तैयारी व्यर्थ तो नहीं जाएगी। किसी और स्पर्धा में काम आ जाएगी। कल मैनेजमेंट के लोग आ रहे हैं । स्कूल का मुआयना और टीचर्स के साथ मीटिंग करना चाहते हैं। मैं भी व्यस्त रहूँगा ।"
वाणी क्या कहती ? हालांकि कहना तो बहुत कुछ चाहती थी पर जानती थी कि प्रिंसिपल मैनेजमेंट को जवाब नहीं दे सकते । उनकी मजबूरी है।
अगले दिन 14 सितंबर था। वाणी ने अपनी कक्षा में ही छोटी सी निबंध स्पर्धा आयोजित कर ली । अन्य छात्रों को समझा-बुझाकर लौटा दिया।
पाठशाला की छुट्टी के बाद सभी शिक्षकों को सभागृह में रुकना था, मीटिंग के लिए । मैनेजमेंट के प्रतिनिधि बोलने के लिए खड़े हुए । सामान्य बातों के बाद उन्होंने कहा -
The agenda of today's meeting is to discuss about encouraging our students to speak in English. It is very sad that most of the times our teachers also speak in Hindi. How will the students develop habit of speaking in English ? Ours is an English medium school. I want that from today itself, all of us should start speaking in English, at least in the school premises. No other language. I hope you.........

आगे ना जाने क्या क्या कहा उन्होंने..... वाणी ने कुछ नहीं सुना । उसके कानों में उसके प्रिय गीत की पंक्तियाँ गूँज रही थीं -
                  हिंदी हैं हम वतन है, हिंदोस्तां हमारा....

......और उसकी आँखें हिंदी दिवस और हिंदी से जुड़े अपने सपनों को चकनाचूर होते देख रही थीं...... सोच रही थी वह कि आखिर कौन जिम्मेदार है नई पीढ़ी की इस सोच के लिए कि - हिंदी का क्या है !!!

Saturday, September 9, 2017

अंधेर नगरी, चौपट राजा !

अंधेर नगरी, चौपट राजा !
टका सेर भाजी, टका सेर खाजा !

राजा पर कोई, अँगुली उठाए,
अँगुली क्या, गर्दन अपनी कटाए !
पंगु व्यवस्था है, अंधा कानून
रोम जले, नीरो बाँसुरी बजाए !

श्वापदों से क्रूरतम, अब मनुष्य हो गया,
सत्य और अहिंसा की, चिताएँ सजा जा ।।
अंधेर नगरी, चौपट राजा !

रामजी के देश में, रावणों का राज
बर्बरता, निष्ठुरता, दमन का रिवाज !
मुँह पर बाँधो पट्टी, बोलो इशारों में
गंध लहू की पसरी, गलियों बाजारों में !

नीच,बोल बोल रहे, ठोंक ठोंक छाती !
लज्जा का चीरहरण, तू भी करवा जा ।।
अंधेर नगरी, चौपट राजा !

आजादी की दुल्हन ने, फाँसी लगाई
धर्म औ' सियासत की, हो गई सगाई !
बेबाक दीवानों को, अक्ल नहीं आई
बोलने की कीमत, रक्त से चुकाई !

झूठी संवेदना की,चाह नहीं रूहों को,
फिर भी श्रद्धांजलि की, रस्म तो निभा जा ।।
अंधेर नगरी, चौपट राजा !

Thursday, September 7, 2017

चलो, खिल्ली उड़ाएँ

चलो हम खिल्ली उड़ाएँ,
लोग जो अच्छे हैं,सच्चे हैं,
सरल हैं, सीधे हैं,
देश की जो सोचते हैं,
भाईचारा पोसते हैं,
उन्हें धमकाएँ, डराएँ !!!
हम मजाक उनका बनाएँ !!!

वे युवक,जो नहीं करते
नकल पश्चिम सभ्यता की,
वे युवतियाँ, जो नहीं करती
तमाशा असभ्यता का,
आज भी रखें बड़ों का मान,
मर्यादा रखें छोटों की जो !
चलो उनको बरगलाएँ
उनकी हम खिल्ली उड़ाएँ !!!

जो ना लें रिश्वत, नहीं हों
लिप्त भ्रष्टाचार में,
जो करें विश्वास,
नेकी, दया, सदाचार में.
खरी सच्ची बात कह दें,
बिन डरे और बिन झुके
दिन को दिन और
रात को जो रात कह दें
मार्ग से उनको हटाएँ !!!

चलो, हम खिल्ली उड़ाएँ !!!