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Saturday, June 17, 2017

बंद दरवाजों की संस्कृति


यह बंद दरवाजों की संस्कृति है,
यहाँ बड़ी शांति है !
महानगरों की ऊँची अट्टालिकाएँ
और डिबिया से घर !

नहीं नजर आती,
आचार, पापड़ और बड़ियाँ
सुखाती, उठाती, 
चाची,ताई और भाभियाँ ।
नहीं जगाता कोई किसी को,
भरी दोपहरी में !

'दीदी, खरी कमाई के पैसे दो,
भाभी, मोजे के कितने फंदे?
कितने उल्टे, कितने सीधे ?
बेटी, ये मेरी चिट्ठी पढ़ दे'

गुम हो गई हैं वे आवाजें,
वो ठहाकेदार हँसी मजाक,
वो बच्चों की चिल्लपों,
यहाँ बड़ी शांति है !

सिर पर रखी टोकरी में
देवी-यल्लम्मा को बिठाए,
वो बूढ़ी याचिका,
एक मुट्ठी चावल के बदले
मिलने वाली करोड़ों की दुआएँ ...
"देवा ! माझ्या मुलीला सुखी राहू दे !"

मोर पंख की टोपी लगाए,
घुंघरू और खंजड़ी की ताल पर
"यमुनेच्या तीरी आज पाहिला हरी"
यह भजन गाता वासुदेव
वे भी यहाँ नहीं आते,
यहाँ बड़ी शांति है !

रोबोट से यंत्रचालित
नापकर मुस्कुराते
तौलकर बोलते,
आत्मकेंद्रित,सभ्य और शालीन,
लोगों की यह बस्ती है.
यहाँ बड़ी शांति है 

अंतर्जाल के आभासी रिश्तों में
अपनापन ढूँढ़ने की कोशिश,
सन्नाटे से उपजता शोर
उस शोर से भागने की कोशिश !

अशांत मनों की नीरव शांति !
यह महानगरों की
फ्लैट संस्कृति है,
बंद दरवाजों की संस्कृति है,
यहाँ बड़ी शांति है !


Monday, June 12, 2017

बरस बीत गया....

पिछले वर्ष 12जून 2016 को मैंने पहली पोस्ट "बंदी चिड़िया"के साथ इस ब्लॉग की शुरूआत की थी।
  वास्तव में इससे पहले मैंने ब्लॉग लेखन के बारे में सुना भर था । कालेज के जमाने से लेखन का शौक था। पापा को भजनों का शौक रहा। अच्छा गाते भी थे और हारमोनियम भी बजाते थे। भजनों से भरी कई डायरियाँ पापा के पास अभी भी हैं। भजन संग्रह का उन्हें काफी शौक रहा । कुछ भजन पापा खुद भी लिखते थे।
उनकी देखादेखी हम बहनों ने भी कई भजन लिखे । मैं कविताएँ एवं गजल जैसा कुछ लिखती रही, किंतु छुपाकर । घर के रूढ़िवादी माहौल में उन्हें बाहर लाने का अर्थ था - अपनी पढ़ाई लिखाई बंद करवा कर घर बैठ जाना ।
  विवाह के बाद तो पारिवारिक जिम्मेदारियों में लिखने का अवकाश ही नहीं मिल पाता था । वाचन में रुचि एवं भाषा की शिक्षिका होने से साहित्य से जुड़ाव बना रहा ।
 लिखने की दूसरी पारी की शुरूआत तीन वर्ष पूर्व अपने पुत्र के अठारहवें जन्मदिन पर एक कविता से की । वह कविता थी - माँ की चिट्ठी । उसके बाद 'बंदी चिड़िया' एवं अन्य कविताएँ लिखीं । कुछ स्थानीय अखबारों में प्रकाशित भी हुई किंतु प्रकाशन को गंभीरता से ना लेते हुए मैंने शौकिया लेखन ही जारी रखा ।
    पिछले वर्ष बहन ने हमारे शहर की ही एक गुजराती लेखिका के ब्लॉग की लिंक भेजी। उसके बाद से मुझे भी लगने लगा कि मैं भी अपना ब्लॉग बनाकर अपनी अभिव्यक्ति को सबके साथ साझा करूँ।  ब्लॉग बनाने की तकनीकी जानकारी शून्य थी। यू ट्यूब से ही सीखकर बनाया था । जैसा बन पाया था उसी पर कुछ पुरानी व कुछ नई रचनाओं को पोस्ट करना शुरू किया।
कहते हैं ना कि 'जहाँ चाह, वहाँ राह '..... दुनिया में आज भी अच्छे लोग हैं और सीखने की चाह रखने वालों के लिए कदम कदम पर शिक्षक हैं । ऐसे ही एक मार्गदर्शक और शुभचिंतक की मदद से मेरे ब्लॉग को यह नया स्वरूप प्राप्त हुआ और एक प्यारा सा नया नाम भी मिला -- 'चिड़िया'....
एक वर्ष में इस ब्लॉग पर 80 पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं जिसके लिए  मैं अपने मार्गदर्शक की बहुत-बहुत शुक्रगुजार हूँ ।
 आप सभी पाठकों और ब्लॉगर मित्रों ने मेरी उम्मीद से भी ज्यादा स्नेह और प्रोत्साहन दिया है जिससे मेरी लेखनी को एक नया जीवन मिला है । मैं तहेदिल से आप सबकी आभारी हूँ ।

अंत में अपनी ही एक कविता की पंक्तियाँ....
"जिंदगी हर पल कुछ नया सिखा गई,
ये दर्द में भी हँसकर जीना सिखा गई...
काँटे भी कम नहीं थे गुलाबों की राह में,
खुशबू की तरह हमको बिखरना सिखा गई...
अच्छाइयों की आज भी कदर है जहाँ में,
दामन में दुआओं को ये भरना सिखा गई..."

Saturday, June 10, 2017

एक और बचपना - 'बकबक'

लिखना-विखना खास नहीं कुछ,
ये तो सारी बकबक है...
सुनने को तैयार नहीं तुम,
किसे सुनाऊँ, उलझन है !!!

मेरी बकबक सुन-सुनकर तुम,

बोर हो गए ना आखिर ?
चिट्ठी लिखकर 'मेल' करूँगी,
पढ़ लेना जब चाहे दिल....
(अरे बाबा, वो मेल मिलाप वाला
'मेल' नहीं, Mail - मेल ! )

फिर भी व्यस्त हुए तो कहना --

"रोज-रोज क्या झिकझिक है ?"
लिखना विखना खास नहीं कुछ,
ये तो सारी बकबक है !!!

मेरी बकबक में मेरे,

जीवन की करूण कहानी है
गुड़िया, चिड़िया, तितली है,
इक राजा है इक रानी है !!!
( याद आया कुछ ? )

परीदेश की राजकुमारी,

स्वप्ननगर का राजकुमार
हाथी, घोड़े, उड़नतश्तरी,
कई शिकारी, कई शिकार !

कितना कुछ कहना है मुझको,

लेकिन वक्त जरा कम है !
सुनने को तैयार नहीं तुम,
किसे सुनाऊँ, उलझन है !!!

ये खाली पन्ने सुनते हैं,

मेरे मन की सारी बात
बोर ना होते कभी जरा भी,
चाहे दिन हो, चाहे रात !

इन पर आँसू भी टपकें तो,

ये कहते हैं - रिमझिम है !
कितना कुछ कहना है मुझको,
लेकिन वक्त जरा कम है !!!

लिखना-विखना खास नहीं कुछ....


Thursday, June 1, 2017

फासला क्यूँ है ...



ज़िंदगी तेरे-मेरे बीच
फासला क्यूँ है ?
तुझको पाने का, खोने का,
सिलसिला क्यूँ है ?

अपने जज्बातों को
दिल में ही छुपाए रखा,
और हर आह को
ओठों में दबाए रखा !
फिर जमाने को मेरी,
खुशियों से शिकवा क्यूँ है ?

मेरे सीने में धड़कती है
तू धड़कन बनकर,
और कदमों से लिपट
जाती है, बंधन बनकर !
मेरी तन्हाई में, यादों का
काफिला क्यूँ है ?

जिस्म मिट जाए, मगर
रूह ना मिट पाएगी,
वो तो खुशबू है,
फिज़ाओं में बिखर जाएगी !
फिर ये दरिया, मेरी आँखों से
बह चला क्यूँ है ?

ज़िंदगी तेरे- मेरे बीच
फासला क्यूँ है ?

Friday, May 26, 2017

नुमाइश करिए

दोस्ती-प्यार-वफा की, न अब ख्वाहिश करिए
ये नुमाइश का जमाना है नुमाइश करिए ।

अब कहाँ वक्त किसी को जनाब पढ़ने का,
इरादा हो भी, खत लिखने का, तो खारिज करिए ।

अपनी मर्जी से चलें वक्त, हवा और साँसें,
कैद करने की इन्हें, आप न साजिश करिए ।

सूखे फूलों को भला कौन खिला सकता है,
आप उन पर भले ही, प्यार की बारिश करिए ।

यहाँ गुनाहे - मोहब्बत की सजा उम्रकैद है,
दूर रहने की इस गुनाह से कोशिश करिए ।

जिंदगी की अदालत फैसले बदलती नहीं,
अब कहीं और रिहाई की गुजारिश करिए।।
***

Sunday, May 21, 2017

माटी

      *माटी*
जब यह तन माटी हो जाए,
काम किसी के आए तो !
माटी में इक पौधा जन्मे,
कलियाँ चंद, खिलाए तो !

सूरज तपे, बनें फिर बादल,
फिर आए वर्षा की ऋतु,
बूँदें जल की, माटी में मिल,
माटी को महकाएँ तो !

माटी के दो बैल बनें,
औ' माटी के गुड्डे - गुड़ियाँ,
खेल - खिलौने माटी के,
बालक का मन बहलाएँ तो !

माटी में वह माटी मिलकर,
कुंभकार के चाक चढ़े,
माटी का इक कलश बने,
प्यासों की प्यास बुझाए तो !

किसी नदी की जलधारा से,
मिलकर सागर में पहुँचे,
सागर की लहरों से मिलकर,
क्षितिज नए पा जाए तो !

उस माटी के कण उड़कर,
बिखरें कुछ तेरे आँगन में,
तेरे कदमों को छूकर,
वह माटी भी मुस्काए तो !!!

Friday, May 12, 2017

तब गुलमोहर खिलता है !

 तब गुलमोहर खिलता है !
-------------–-------------------------
फूले पलाश झर जाते हैं,
टेसू आँसू  बरसाते हैं,
दारुण दिनकर की ज्वाला में,
जब खिले पुष्प मुरझाते हैं,
सृष्टि होती आकुल व्याकुल,
हिमगिरी का मुकुट पिघलता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!

जिद्दी बच्चे सी मचल हवा,
पैरों से धूल उड़ाती है,
तरुओं के तृषित शरीरों से,
लिपटी बेलें अकुलाती हैं,
जब वारिद की विरहाग्नि में,
धरती का तन मन जलता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!

निर्लिप्त खड़ा यूँ उपवन में,
ज्यों कोई दुःख ना कोई सुख,
रक्तिम फूलों की आभा से,
लाल हुआ है सुंदर मुख !
जब कोकिल की मीठी वाणी का,
रस पेड़ों पर झरता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!

तपती धरती, तपता अंबर,
प्रकटी है अग्नि, फूल बनकर,
सिंदूर सजाए सुहागन सा
तेजोमय यह सौंदर्य प्रखर !
नदिया के सूने तट कोई ,
जब राह किसी की तकता है...
तब गुलमोहर खिलता है !!!

Sunday, May 7, 2017

कायरता

*कायरता*

यही तो कर्मभूमि है
इसे तजना है कायरता,
समझ लो युद्धभूमि है,
इसे तजना है कायरता।।
यही तो कर्मभूमि है....

कभी तलवार भी तुमको,
उठानी हाथ में होगी,
हमेशा फूल से नाजुक,
बने रहना है कायरता।।
यही तो कर्मभूमि है....

नहीं होगा हमेशा ही,
यहाँ मौसम बहारों का,
बढ़ो, तूफान झंझा में,
रुके रहना है कायरता।।
यही तो कर्मभूमि है....

गलीचे मखमली,कलियाँ,
नर्म फूलों की पंखुड़ियाँ,
नहीं कदमों तले हों, तो
सफर तजना है कायरता।।
यही तो कर्मभूमि है....

समर में कूद जाओ तो,
लड़ो फिर जंग आखिर तक,
अधर में छोड़कर रण को,
पलट जाना है कायरता।।
यही तो कर्मभूमि है....

कहो तुम बात अपनी भी,
सुनो तुम बात भी सबकी,
मगर हर बात पर 'हाँ जी'
कहे जाना है कायरता।।
यही तो कर्मभूमि है....

करो तुम श्रेष्ठतम अभिनय,
जगत की रंगभूमि में,
प्रदर्शित भाव में बहकर,
भटक जाना है कायरता ।।
यही तो कर्मभूमि है.....

Sunday, April 30, 2017

रात

सुरमई पलकों में सपने,
बुन गई फिर रात,
चुपके से बातें हमारी
सुन गई फिर रात

बाग के हरएक बूटे पर
बिछी कुछ इस तरह,
शबनमी बूँदों में भीगी
नम हुई फिर रात...

रातरानी की महक से
फिर हवा बौरा गई,
इक गजल महकी हुई सी
लिख गई फिर रात...

सरसराहट पत्तियों की,
कह गई हौले से कुछ,
फिर हुई कदमों की आहट,
रुक गई फिर रात...

मेरी निंदिया को चुराकर,
साथ अपने ले गई,
कौन जाने दूर कितनी,
रह गई फिर रात...

Monday, April 24, 2017

समय - समय की बात

समय - समय पर,
'समय - समय की बात'
होती है...
एक ही बात,
किसी समय खास,
तो किसी और समय,
आम होती है...

मुहब्बत के इजहार का वक्त,
अब समय सारिणी बताएगी,
माँ भी बेटे से मिलने
अब समय लेकर आएगी....

हँसने का, रोने का,
रूठने - मनाने का,
चुप रहने या गाने का,
प्यार का, तकरार का,
पतझड़ का, बहार का,

हर बात का समय जनाब,
अब कीजिए मुकर्रर,
जज्बातों को आना होगा,
दिल में, समय लेकर....

आदमी अब व्यस्त है,
भावनाएँ त्रस्त हैं,
दरवाजा खटखटाती हैं,
ना खुलने पर बेचारी,
उलटे पाँवों लौट जाती हैं....

Friday, April 14, 2017

जीवित देहदान

ज़िंदगी की प्रयोगशाला में
ज़िंदा शरीरों पर
किए जाते हैं प्रयोग,
यहाँ लाशों का नहीं
कोई उपयोग !
शर्त उसपर ये कि
आत्मा भी ज़िंदा हो
बची उस शरीर में !

और वह ज़िंदा शरीर
सहता हर चीर - फाड़
पूरे होशो हवास में !
वक्त, उम्र, हालात,
ये तीन डॉक्टर, और
उनकी पूरी टीम यानि
उसी ज़िंदा शरीर के
सगे, अपने, दोस्त, प्यारे,
मिलकर करते प्रयोग
अनेक प्रकार के !

तरह तरह की यातनाएँ,
शारीरिक, मानसिक,
हर प्रताड़ना - वंचना से,
गुजारकर परखते हैं
लिखते जाते हैं शोधग्रंथ,
निष्कर्ष नए - नए !

इस सारी प्रक्रिया के बाद भी
जो बच जाता है ज़िंदा,
उस पर फूल बरसाए जाते हैं
नवाजा जाता है उसे
महानता के खिताब से
सजा दिया जाता है
म्यूजियम में वह जिंदा शरीर,
ताकि और लोग भी ले सकें
प्रेरणा 'जीवित देह'दान की !

Sunday, April 9, 2017

चलता चल

चलता चल

चलता चल, चलता चल,
झरने सा बहता चल !

कंटकों से भरा मार्ग,
पथरीली राह है ,
काँच की किरचें बिछीं,
पैर हुए लहुलुहान ?
हँसता चल !
चलता चल....

प्रीत जिनसे है अधिक,
उनसे ही मिलती हैं
सौगातें दर्द की,
पीड़ा सह, वज्र सम,
बनता चल !
चलता चल....

फूलों की घाटियाँ,
हरियाली वादियाँ,
स्वप्न ही सही मगर,
सपनों में रंग नए ,
भरता चल !
चलता चल....

तू अचूक लक्ष्य पर,
तीर का संधान कर,
नब्ज पकड़ वक्त की ,
सही समय,सही कार्य,
करता चल !

चलता चल, चलता चल,
झरने सा बहता चल ।।

Saturday, April 1, 2017

ओ मेरे शिल्पकार !

ओ मेरे शिल्पकार,
पत्थरों को तराशनेवाले कलाकार,
आओ तुम्हें कुछ पत्थर दे दूँ,
गढ़ पाओ तो गढ़ लेना
एक नई सूरत नई मूरत,
कल्पना करो साकार !
ओ मेरे शिल्पकार !

हालातों को सँभालते-सँभालते,
पत्थर हो गईं संवेदनाएँ,
आँसुओं को रोकते-रोकते
पथरा गईं आँखें,
तराश लो इन पत्थरों को,
दो कोई आकार !
ओ मेरे शिल्पकार !

हाड़ माँस का यह शरीर भी,
पत्थर ही समझ लो,
बेजान साँसे, निष्प्राण धड़कनें,
चलती हैं,चलने दो !
उठाओ तुम छेनी हथौड़ा
डरो मत, करो प्रहार !
ओ मेरे शिल्पकार !

डरो मत, नहीं टपकेगा,
खून उन जख्मों से
हाँ, दर्द रिस सकता है !
और दर्द का तो नहीं होता,
कोई रंग - रूप - आकार !
ओ मेरे शिल्पकार !

तराशते तराशते जब,
पहुँच जाओ उस हिस्से तक,
जिसे दिल कहते हैं,
रुक जाना तब, मेरे शिल्पकार !
वह अभी नहीं हुआ पत्थर,
बसता है उसमें प्यार !
ओ मेरे शिल्पकार ! 

Sunday, March 26, 2017

प्रेम बड़ा छ्लता है

प्रेम बड़ा छ्लता है,
साथी, प्रेम बड़ा छलता है ।
जलती तो बाती है,
साथी, दीप कहाँ जलता है ?
प्रेम बड़ा छलता है ।

कहीं किसी से जीवनभर में
प्रीत नहीं जुड़ पाती है,
कहीं अजानी मंजिल को
राहें खुद ही मुड़ जाती हैं,
बगिया के फूलों को कब
माली का परिचय मिलता है ?

प्रेम बड़ा छलता है,
साथी, प्रेम बड़ा छ्लता है ।

मन से मन के तार जुड़ें तो,
हर दूरी मिट जाती है
हिमगिरी से निकली गंगा,
सागर तक दौड़ी आती है ।
बोलो,कब खुद सागर आकर
किसी नदी से मिलता है?

प्रेम बड़ा छलता है,
साथी, प्रेम बड़ा छलता है ।

इसी प्रेम ने राधाजी को
कृष्ण विरह में था तड़पाया,
इसी प्रेम ने ही मीरा को,
जोगन बन, वन वन भटकाया।
यह दुर्लभ उपहार प्रेम का,
कहाँ सभी को मिलता है?

प्रेम बड़ा छ्लता है,
साथी, प्रेम बड़ा छ्लता है।।

Wednesday, March 15, 2017

दोषी हो तुम !

दोषी हो तुम !
*********
स्वार्थ के इस दौर में जब,
अविश्वास और संदेह के भाव,
घुट्टी में पिलाए जा रहे हैं....
तुम संप्रेषित कर रहे हो,
निष्पाप भावनाएँ, कोमल संवेदनाएँ...
छूत का ये रोग क्यों फैला रहे हो ?
दोषी हो तुम !

क्यों नहीं तुम देख पाते,
शुभ्रता के आवरण में कालिमा ?
क्यों नहीं पहचान पाते,
कौन है अपना - पराया
बीज कुछ अनमोल रिश्तों के,
अभी भी बो रहे हो ?
दोषी हो तुम !

चाँद को क्यों आज भी तुम,
देखते हो 'उस' नजर से
अरे पागल, कलंकित हो चुका वह !
छू लिया इंसान ने कबका उसे !
और तुम उसको अभी तक,
प्यार अपना कह रहे हो ?
दोषी हो तुम !

Monday, March 13, 2017

होली

होली
होली के अवसर पर सारे,
रंगों को मैं ले आऊँ,
और तुम्हारे जीवन में मैं,
उन रंगों को बिखराऊँ...

लाल रंग है गुलमोहर का,
केशरिया पलाश का है,
पीला टेसू, अमलताश का,
नीला रंग आकाश का है...

मोरपंखिया रंग में मेरे,
मनमयूर का नृत्य देखना,
सिंदूरी रंग में घोले हैं,
सूर्योदय - सूर्यास्त देखना...

याद आ रही है अब मुझको,
मेरे बचपन की गुड़िया !
इसीलिए मैं भेज रही हूँ,
रंग गुलाबी की पुड़िया...

भेज रही हूँ हरे रंग में
धरती की सारी हरियाली,
ईश्वर से है यही प्रार्थना,
छाए जीवन में खुशहाली...

प्रेमरंग बिन सब रंग फीके,
रंगों बिन फीकी होली !
कोई खेले या ना खेले,
होली तो होगी, हो ली !!!

Sunday, March 5, 2017

दूर जाना चाहते हो ?

दूर जाना चाहते हो ?
यूँ परायापन जताकर
क्यूँ रुलाना चाहते हो ?
दूर जाना चाहते हो ?

अभी अभी तो शुरू हुआ है,
साथ चलना, सहप्रवास,
जरा देर पहले ही तो,
दे सहारा, थामा हाथ !
अब छुड़ाना चाहते हो ?
दूर जाना चाहते हो ?

एक विनती मान लेना,
संग चलना उस क्षितिज तक,
देख लूँ नयनों से अपने,
मैं धरा से गगन मिलते...
लेख नियति ने लिखा यह,
क्यों मिटाना चाहते हो ?
दूर जाना चाहते हो ?

साथ मेरा गर ना भाए,
तुम कदम आगे बढ़ाना,
मैं चलूँगी जरा पीछे !
पथप्रदर्शक ही रहो तुम,
पथ मेरा उज्जवल तो होगा !
प्यार की मासूमियत को,
आजमाना चाहते हो ?
दूर जाना चाहते हो ?

यूँ परायापन जताकर,
क्यूँ रुलाना चाहते हो ?

Wednesday, March 1, 2017

बिखरे सुमन


बिखरे सुमन.

जीवन की बगिया में,
संवेदनाओं के,
बिखरे सुमन !
कुछ हैं खयालों के,
कुछ भावनाओं के, 
बिखरे सुमन ।।

पेड़ों की शाखों से,
उलझी हवाएँ तो,
बरसी जो मौसम की,
पहली घटाएँ तो,
बिखरे सुमन !

जीवन की बगिया में,
बिखरे सुमन।।

उम्मीदें मिलने की,
खुशबू में लिपटे से...
डर है बिछड़ने का,
सहमे से सिमटे से,
बिखरे सुमन !

इक दिल ने दूजे से
की मौन बातें तो,
यादों की बरखा में
भीगी जो आँखें तो,
बिखरे सुमन !

जीवन की बगिया में
बिखरे सुमन ।

दिल उनका बोले,
सुने मेरी धड़कन ,
ये शब्दों के स्पंदन,
किए उनको अर्पण,
तो बिखरे सुमन !

जीवन की बगिया में
बिखरे सुमन।।

Tuesday, February 21, 2017

जीवन - घट रिसता जाए है...

जीवन-घट रिसता जाए है...
काल गिने है क्षण-क्षण को,
वह पल-पल लिखता जाए है...
जीवन-घट रिसता जाए है ।

इस घट में ही कालकूट विष,
अमृत है इस घट में ही,
विष-अमृत जीवन के दुःख-सुख,
मंजिल है मरघट में ही !
जाने कितने हैं पड़ाव,
जिन पर मन रुकता जाए है...
जीवन घट रिसता जाए है ।

कभी किसी की खातिर भैया,
रुकता नहीं समय का पहिया,
चलती जाती जीवन नैया,
इस नैया का कौन खिवैया ?
बैठ इसी नैया में हर जन,
कहाँ पहुँचता जाए है ?
जीवन घट रिसता जाए है ।

युगों-युगों से रीत यही है,
जीना है आखिर मरने को,
जन्म नवीन, नया नाटक है,
नई भूमिका फिर करने को !
अगला अंक लिखे कोई तो,
पिछला मिटता जाए है....
जीवन - घट रिसता जाए है !
जीवन - घट रिसता जाए है ।।

Sunday, February 19, 2017

आधा चंद्र

आज गगन में,
आधा चंदा निकला है,
टूट के आधा,
कहाँ गिर गया रस्ते में ?

गिरते गिरते अटक गया,
या कहीं रास्ता भटक गया?
चलो पार्क में देखें हम,
क्या किसी पेड़ पर लटक गया ?

अगर किसी ने कैद कर लिया,
पूनम कैसे आएगी,
रात अधूरे चंदा से,
कितने दिन काम चलाएगी ?

ढूँढ़ ढूँढ़ कर हारे हम,
पहुँचे नदी किनारे हम !
पानी में कुछ चमक रहा था,
हीरे सा वह दमक रहा था ।

वही चाँद का आधा टुकड़ा,
जो आधे चंदा से बिछड़ा,
पानी में छप - छप करता था,
हिरन कुलाँचें ज्यों भरता था !

जब यह वापस जाएगा नभ,
चंद्र पूर्णता पाएगा तब ,
फिर से पूनम आएगी,
रात दुल्हन बन जाएगी !!!

Thursday, February 16, 2017

कन्हैया

तेरी कृपा का अनुभव.
हर बार हुआ मुझको,
बिन देखे तुझे, तुझसे
अब प्यार हुआ मुझको....

मैंने ये जब भी समझा
तू पास नहीं मेरे,
मेरे ही दिल में तेरा
दीदार हुआ मुझको...

ठुकराए ये जमाना
परवाह नहीं मुझको
तेरे प्यार पर कन्हैया
ऐतबार हुआ मुझको...

तेरी कृपा के आगे
है शून्य हर खजाना,
तिनके सा तुच्छ मोहन,
संसार हुआ मुझको....

तेरी दया ही तेरा,
इजहार-ए-मोहबत
अब दूर तुमसे रहना
दुश्वार हुआ मुझको...

तेरी कृपा का अनुभव
हर बार हुआ मुझको ।।

Saturday, February 11, 2017

बचपना

बचपना

कभी कभी यूँ लगता है....
मैं एक चिड़िया होती,
सुबह जगाती आपको,
चूँ चूँ करके दाने माँगती,
खिड़की से आकर,
बैठ जाती आपकी टेबल पर !
लिखते जब कुछ आप,
मैं निहारती चुपचाप !

कभी कभी यूँ लगता है....
मैं चाबी वाली गुड़िया होती,
चाबी खुद में खुद भर लेती,
आपके पीछे पीछे घूमती,
सारे घर में !
नीले मोतियों सी आँखों से
कह देती हर बात !

कभी कभी यूँ लगता है....
मैं हवा होती,
छूकर हौले से जाती,
हलकी थपकियाँ दे सुलाती !
कभी आप लिखते और....
मैं सारे पन्ने उड़ा देती,
मजा आता ना !

कभी कभी यूँ लगता है....
मैं बदली होती,
बरसती उसी दिन,
जब निकलते आप,
बिन छाते के घर से !
कर देती सराबोर,
नेह जल से !

और जब मैं ये सब करती,
पता है, आप क्या कहते ?
आप कहते ----
"ये क्या बचपना है ?"
---------

Thursday, February 9, 2017

चलो ना !!!


 चलो ना !!!
चलो ना,
मेरे हमसफर, 
इस जनम की तरह
हर जनम में, 
अनगिनत जन्मों की,          
इस अनंत यात्रा के पथ पर 
तुम साथ चलो ना !

ना तुम अनुगामी,
ना मैं अवलंबित,
एक राह के हम पथिक !
तो इक दूजे का,लेकर
हाथों में हाथ, चलो ना !
पथ पर साथ चलो ना !

चलो लगा लें फिर फेरे,
इस बार अग्निकुंड के नहीं,     
अखिल ब्रह्मांड के !
साक्षी होंगे इस बार
वह धधकता सूर्य,
ग्रह, शीतल चाँद, तारे !

आओ, फिर एक बार 
इक दूजे को आज नए               
वचनों में बाँध चलो ना!
उस पथ पर, 
साथ चलो ना !

देहों के दायरों से परे,
मन से मन का मिलन,
नई रीत का प्रतीक !
मैं लिखूँ , तुम रचो
तुम लिखो, मैं रचूँ
नया काव्य - नए गीत !

साथी, सहयात्री बनकर, 
दिन औ' रात, चलो ना !
हर पथ पर साथ चलो ना !
बस तुम साथ चलो ना!!!
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Sunday, January 29, 2017

मोबाइल को छुट्टी दे दो....

एक दिन मोबाइल को
छुट्टी दे दो....

फिर से किताबों को,
भोले से ख्वाबों को,
लट्टू पतंगों को,
रिश्तों के रंगों को,
ढूँढ़ने चलो, या फिर
चिट्ठी लिख लो...

एक दिन मोबाइल को
छुट्टी दे दो....

यादों की परियों से,
बचपन की गुड़ियों से,
बट्टी कर लो,
वाट्स अप और
फेसबुक से
कट्टी कर लो...

एक दिन मोबाइल को
छुट्टी दे दो....

फिर ब्रश उठाओ,
कोई पेंटिंग बनाओ,
या सारे दोस्तों को,
घर पर बुलाओ,
अपनों के संग थोड़ी
मस्ती कर लो...

इक दिन मोबाइल को
छुट्टी दे दो....

चलो गाओ गाने,
वो भूले तराने,
तबला उठाओ,
हारमोनियम बजाओ,
चाहे शायरी - कविता
टूटी फूटी कर लो....

एक दिन मोबाइल को
छुट्टी दे दो....


Wednesday, January 25, 2017

इंसान बदल जाते हैं...

मौसम की तरह से यहाँ इंसान बदल जाते हैं..
उस पर ये शिकायत है कि हालात बदल जाते हैं ।

हम इबादत का तरीका भी ना बदल पाए...
और कुछ लोगों के भगवान बदल जाते हैं ।

खेलते हैं लोग, इस कदर जज्बातों से...
कभी रिश्ते, कभी पहचान बदल जाते हैं ।

रुकता नहीं, कभी, कहीं, यादों का काफिला..
हम भी तिनके सा, इस दरिया में बहे जाते हैं ।

ना उम्मीद मोहब्बत की, ना वफा की आरजू...
लो आप की गुस्ताखियाँ भी माफ किए जाते हैं ।

नहीं मंजूर हमें, अपने मुकद्दर का फैसला...
खुदी बुलंद कर, अंजाम बदल जाते हैं ।



               
   

Saturday, January 21, 2017

ये जिंदगी


ये जिंदगी

अनगिनत मोड़ों से गुजरती,
फिर वही,
भागती दौड़ती जिंदगी...

ऊँचे - ऊँचे इरादों के पहाड़ पार करती,

कभी कठिनाइयों की खाई में उतरती,
कभी थक कर बस एक पल को ठहरती,
फिर अनगिनत मोड़ों से गुजरती,
भागती दौड़ती ये जिंदगी.

मासूम रिश्तों की छाँव में सुस्ताती,
यादों की सुनसान घाटियों में भटकाती,
टेढ़े - मेढ़े रास्तों पर गिरती सँभलती,
फिर अनगिनत मोड़ों से गुजरती,
भागती दौड़ती ये जिंदगी

स्वार्थ के काँटों की चुभन से सिहरती,

प्यार के फूलों की महक से महकती,
खुशियों की बगिया में चिड़ियों सी चहकती,
फिर अनगिनत मोड़ों से गुजरती,
भागती दौड़ती ये जिंदगी.
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Saturday, January 14, 2017

दास्ताँ लिख लूँ....

फिर चले आओ अजनबी बनकर,
फिर तुम्हें अपना रहनुमा लिख लूँ ।

तुम जो नजरों की जुबाँ में पढ़ लो,

मैं तुम्हें पहला खत अपना लिख लूँ ।

तुम लिखो दिल में, मेरी यादों को,

और मैं तुमको भूलना लिख लूँ ।

थोड़े नादान हैं अल्फाज मेरे,

तुम कहो तो, मैं बचपना लिख लूँ ।

जिद करो तुम  मुझे मनाने की,

आज मैं तुमसे रूठना लिख लूँ ।

जो उमड़ आई है पलकों के तले,

उस घटा का मै बरसना लिख लूँ ।

वक्त उड़ता है पंछियों की तरह,

चंद लम्हों में भला क्या लिख लूँ ।

चले जाना, ज़रा ठहर जाओ,

जो है बाकी वो, दास्ताँ लिख लूँ ।

Wednesday, January 11, 2017

पाषाण


पाषाण

सुना है कभी बोलते,
पाषाणों को ?
देखा है कभी रोते ,
पाषाणों को ?

कठोरता का अभिशाप,
झेलते देखा है ?
बदलते मौसमों से,
जूझते देखा है ?
पाषाणों से फूटते फव्वारें
देखे हैं कभी ?

कौन कहता है
पाषाणों मे दिल नहीं होते ?

रोते हैं पाषाण
जब बन जाते हैं वे,
किसी के
खून बहाने का जरिया...
चीखते हैं पाषाण
जब टूटते - बिखरते हैं,
मानव के क्रूर हाथों,
अथवा गढ़े जाते हैं
मूक मूर्तियों में.

कौन करता है परवाह
उनकी चाहत की?
कोई पूछे तो सही
उनको क्या बनना है ?

खामोश रहते हैं पाषाण,
होते हैं जब जिंदा दफन,
नींव का पत्थर बनकर.
नहीं माँगते हक अपना,
इठलाती-इतराती इमारतों से.

घोंट देते हैं गला,
अपनी इच्छाओं का
बलिदान हो जाते हैं
पराए सौंदर्य को
सँभालने - सँवारने में.

कौन कहता है
पाषाणों मे दिल नहीं होते ?

मुस्कुरा देते हैं पाषाण
जब कहती है कोई प्रेयसी,
अपने प्रियतम को
----”पत्थर दिल”’
और तब भी जब
कोई इंसान पा जाता है
पत्थर की उपाधि

बह जाते हैं पाषाण
नदियों के प्रवाह संग
घिसते - छीजते हैं बरसों,
तब जाकर पाते हैं
रूप शालिग्राम का
और कहलाते हैं -- 
 'स्वयंभू' ....

कौन कहता है
पाषाणों मे दिल नहीं होते ?

Monday, January 9, 2017

तेरी प्यार वाली नज़र पड़ी....

तेरी प्यार वाली नज़र पड़ी
तो ये सारा आलम बदल गया, 
तूने मुस्कुराकर क्या कहा,
मेरा गुरूर सारा पिघल गया...
          तेरी प्यार वाली नज़र....

जो मैं तुझसे रूठूँ, मेरी खता 
जो तू माफ़ कर दे, तेरा करम,
ये बात आपस की है सनम,
तेरे कहने से दिल बहल गया...
         तेरी प्यार वाली नज़र....

तेरी रहमतों का ये सिलसिला,
ना तो कम हुआ, ना रुका कभी
जब लड़खड़ाए कदम मेरे,
तूने हाथ थामा, सँभल गया...
          तेरी प्यार वाली नज़र ....

वही मधु भरी सुन बाँसुरी,
जिसे सुन के मीरा बावरी,
तेरी हो गयी, कहीं खो गई
क्या उसी का जादू चल गया ?
        तेरी प्यार वाली नज़र.... 

है युगों का नाता तेरा-मेरा,
नहीं प्रीत अपनी नई-नई 
तू कहाँ है ये भी पता नहीं,
तुझे खोजने भी निकल गया...
         तेरी प्यार वाली नज़र...

Saturday, January 7, 2017

अग्निपरीक्षा

कितने ही युग बीत गए
समय के प्याले भरे,
और रीत गए....
किन्तु नहीं बदला
आज भी रिवाज
स्त्री की अग्निपरीक्षा का !

पुरुष कोई राम नहीं,
हक़ फिर भी है उसे
अग्निपरीक्षा लेने का
स्त्री कोई सीता नहीं,
धैर्य फिर भी है उसमें
अग्निपरीक्षा देने का !

वह परीक्षा नहीं थी
सीता के सतीत्व की,
वह था  प्रमाण केवल
राम के प्रति प्रेम का...
समाना था धरा में ही
क्या पहले, क्या बाद में ?

अब मेरी बारी है
सह लूँगी, कहूँगी नहीं...
विश्वास है, खरी उतरूँगी
हर परीक्षा में !
धरा में समाने से
रोक तो पाओगे न ?



Thursday, January 5, 2017

दीदी

दीदी

हर दिन की तरह मुंबई की लोकल ट्रेन खचाखच भरी हुई थी. यात्री भी हमेशा की तरह अंदर बैठे, खड़े थे. गेट के पास कुछ यात्री हेंडल पकड़े खड़े थे, तो कुछ बाहर की तरफ झुके हुए थे. दैनिक यात्री रोजमर्रा की तरह लटकने का मजा ले रहे थे. लेकिन आज विशेष था कि मुंबई में पली बढ़ी दीपा पहली बार लोकल ट्रेन में चढ़ने अपने पति के साथ आई थी. पहली बार ससुराल से बाहर आई थी, वह मुंबई विश्वविद्यालय से एम ए का फार्म लेने.

दीपा के विवाह को अभी एक महीना भी नहीं गुजरा था. बी एड करते समय ही सगाई हो गई थी और परीक्षा होते ही शादी. शादी के पंद्रह दिनों बाद  ही बी एड रिजल्ट आ गया था. अच्छे नंबर थे.

दीपा अपने ससुराल की बड़ी बहू बनकर आई थी. इसलिए उस पर वहाँ का बोझ पडना संभावित ही था. घर सँभालते हुए, उस नए परिवेश में अपना परिचय देते हुए, अपनी साख बनाते हुए, बाहर जाकर नौकरी करना दीपा के लिए असंभव सा था. वैसे भी दीपा को अपने घर से कालेज के अलावा कोई रास्ता भी तो पता न था. अकेली जाती तो भी कहीं कैसे. इन हालातों को देखते हुए फिलहाल उसने कहीं नौकरी का विचार नहीं किया. मन में तो बहुत सबल इच्छा थी कि वह अपने पैरों पर खड़ी होकर कुछ करे किंतु हालात साथ नहीं दे रहे थे. 

हालातों को समझते हुए उसने बीच का एक रास्ता चुना. घर पर ही ट्यूशन्स शुरु करने का सोचा और साथ ही एम ए करने का भी.

आज वह अपने पति के साथ बाहर निकली थी. शादी के बाद पहली बार. घूमने नहीं, मुंबई विद्यापीठ से एम ए का फॉर्म भरने. लोकल ट्रेन की भीड़ - भाड़ की वह आदी नहीं थी.

वैसे तो वह उसी शहर की थी. पर दीपा के अपने घर भी वही सब बंधन थे जो उस समय एक भारतीय परिवार में हुआ करते थे. जैसे – अँधेरे के पहले लड़कियों का घर लौटना, लड़कों से संपर्क रखने की मनाही, समय पर घर से निकलना व समय पर घर पहुँचना, अकेले दूर तक जाने की मनाही, इत्यादि. आज के जमाने से परखा जाए तो वह एक डरपोक परिवार था. फलस्वरूप दीपा मुंबई में पली - बढ़ी होने के बावजूद भी शहरी माहौल से अनभिज्ञ रही, वहाँ के रास्तों से अपरिचित रह गई. संक्षेप में कहें तो दीपा डरपोक रह गई.

दीपा एम ए का फार्म भरकर वापस लौट रही थी. लोकल हमेशा की तरह  खचाखच ही भरी थी. स्टेशनों के आते - जाते भीड़ - भरी लोकल ट्रेन धीरे - धीरे खाली हो रही थी. गेट पर खड़े लोग भीतर खड़े होते जा रहे थे. जो बाहर लटक रहे थे. वे धीरे - धीरे भीतर की तरफ हो रहे थे. कुछ जिनको जगह मिल रही थी, वे सीटों पर बैठ रहे थे. ठाणे स्टेशन आते - आते दीपा व पति को भी बैठने को सीट मिल गई थी.

तभी अचानक दीपा की नजर एक नीले शर्ट पहने लड़के पर पड़ी. वह इस चलती लोकल ट्रेन में से सिर बाहर लटकाकर खड़ा था. दीपा का माथा फिर गया. पता नहीं क्या हो रहा था उसे. शायद वह अपनी बीती जिंदगी में से कुछ याद कर रही थी. वह अपने आपको नियंत्रित नहीं कर पाई. वह झटके से उठी और सीधे उस लड़के के पास जाकर, बिना कुछ कहे, उसकी शर्ट पकड़कर, उसे अंदर खींच लिया. उस पर भी शायद मन नहीं भरा था दीपा का. दीपा ने उसे घूरते हुए, कड़े स्वर में डाँटते हुए, कहा  अंदर खड़े हो जाओ समझे, जगह है ना, फिर बाहर क्यों लटक रहे हो ?

लड़का परेशान! ये कौन मेरी आजादी में खलल डालने चली आई ? दूसरे यात्री आश्चर्य से व पति जलती हुई नजरों से दीपा को घूर रहे थे. वह सत्रह अठारह साल का लड़का भला क्यों उसकी बात मान ले ? वह तो फिर पहुँच गया वापस अपनी जगह पर. दीपा के पति, दीपा की इस हरकत पर नाराज हुए और पास जाकर दीपा को हाथ से खींचकर, सीट पर लाकर बैठा दिया.

दीपा ने पति की इस हरकत को अपने स्वाभिमान पर प्रहार सा महसूस किया. किसी को समझ नहीं आ रहा था कि दीपा ने ऐसी हरकत क्यों की ? दीपा को भी शायद पता नहीं था कि इस जन-वन में किसी को किसी की नहीं पड़ी है. भावनाएँ मर चुकी हैं. किसी के प्रति संवेदना, उनके काम में दखल माना जाता है यहाँ. फलस्वरूप दीपा दोनों हाथों में मुंह छुपाकर फफक - फफक कर रो पड़ी. कमल, दीपा के पति को जैसे काटो तो खून नहीं. क्रोध उनके चेहरे पर स्पष्ट दिख रहा था. पर वे सँभले हुए थे. उनको दीपा की मानसिकता का ज्ञान था.

दीपा से इस प्रकार की प्रतिक्रिया का अंदाजा न उस लड़के को था, न दीपा के पति को और न ही अन्य मुसाफिरों को. पास बैठी एक बुजुर्ग महिला ने पर्स से पानी का बोतल निकाला और दीपा के सिर पर प्यार से हाथ फेरकर कहा –

‘’क्या हुआ बेटा ?,  
चुप हो जाओ,
पानी पी लो.’’ 

दीपा के पति से पूछा : अचानक इन्हें क्या हो गया

पति से उत्तर मिला - इनका सत्रह - अठारह बरस का भाई, आज से लगभग दो साल पहले, इसी तरह लोकल ट्रेन से घर आ रहा था. वह भी भीड़ के कारण बाहर लटककर सफर कर रहा था. एक जगह उसका सर किसी खंभे से टकराया और वह चलती ट्रेन से गिरा पड़ा. बस... ....बाकी बात उन्होंने इशारे से समझा दिया.

सारे यात्री दीपा के बारे कही जाने वाली बातें सुन रहे थे, यह सब जानकर अचानक भावुक हो गए. ओह !!! कहते हुए सभी यात्रियों में इसी विषय पर बातें चल पड़ी. वह लड़का भी बातों की भावनाओं में आकर अंदर की एक खाली सीट पर बैठ गया.

बातों - बातों में अगले स्टेशन भी आते गए. दीपा ने देखा वह लड़का अंदर सीट पर बैठ गया था. उसने दीपा की हालत देखी थी, तो कुछ कह नहीं पाया था. 

जब पति के साथ दीपा अपने स्टेशन पर उतरने लगी थी गाड़ी से - तब लड़के ने सिर्फ इतना कहा -

दीदी - "आई एम सॉरी दीदी."

दीपा अभी - अभी शांत हो पायी थी. लड़के की बात सुनकर उसकी आँखों की कोरें फिर भीग गई.
दीपा ने ममता भरा हाथ उसके सिर पर फेरा और आगे बढ़ गई.

सबने देखा दीपा को अपनी आँखों की नम कोरों को पोंछते हुए.
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